पुलवामा के बाद भड़काने वाली पत्रकारिता से किसका भला?

by Umesh Paswan

भारत-पाकिस्तान के बीच जिस तरह के रिश्ते हैं उसमें मीडिया कवरेज कभी भी संतुलित और ऑब्जेक्टिव नहीं रहा. ये भी सही है कि जंग और युद्धोन्माद जैसा कुछ नहीं बिकता.

वह सुपरहिट मसाला होता है और दुनिया भर का मीडिया इसका इस्तेमाल अपनी लोकप्रियता और मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए करता रहा है. भारत और पाकिस्तान का मीडिया भी यही कर रहा है.

इसके बावजूद कहा जाना ज़रूरी है कि 14 फ़रवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ़ के 40 से अधिक जवानों की मौत के बाद से अब तक का मीडिया कवरेज पत्रकारिता के नए गर्त को छूने वाला रहा है.

उसने पत्रकारिता की तमाम नियंत्रण रेखाओं का उल्लंघन करके ख़ूब बदनामी कमाई है. इसमें कोई संदेह नहीं, ये पत्रकारिता के लिए सबसे बुरा वक़्त है.

यही वज़ह है कि आज बड़बोले और भड़काऊ ऐंकरों को खलनायकों की तरह देखा जा रहा है. उनकी चहुँ ओर निंदा-भर्त्सना हो रही है.

Related Posts