आज ही के दिन इंदिरा गांधी के निर्वाचन को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अमान्य करार दिया था

by Umesh Paswan

1975 में आज ही के दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाया और उनका निर्वाचन रद्द कर 6 साल चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी फैसले के 2 हफ्ते के भीतर ही इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी का ऐलान कर दिया

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन सिन्हा के सक्षम इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव में भ्रष्टाचार का मामला चल रहा था समाजवादी नेता राजनारायण ने यह मामला दायर किया था न्यायमूर्ति जगमोहन सिन्हा ने 12 जून 1975 को मामले का फैसला सुनाया इंदिरा गांधी को दोषी करार देकर 6 वर्ष के लिए उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता स्थगित हो गयी इंदिरा गांधी के सक्षम इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था पूरे देश में भूचाल आ गया।

इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने स्थगन आदेश दिया लोकसभा के कामकाज में भाग लेने की अनुमति दी लेकिन मतदान पर पाबंदी लगा दी वे प्रधानमंत्री के पद पर रह सकती हैं यह भी न्यायमूर्ति ने कहा लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर पूर्णा अवधि स्थगन आदेश न देते हुए सीमित अवधि के लिए स्थगन आदेश दिया फैसले की तिथि थी 24 जून 1975 अगली सुनवाई की तिथि मुकर्रर की गई लेकिन वह दिन कभी आया ही नहीं 24 जून को इंदिरा गांधी ने आपातकाल की अधिघोषणा अध्यादेश जारी की। इंदिरा गांधी की समस्या यह थी कि न्यायालय का सम्मान कानून का राज्य, राज्य संविधान की पवित्रता बरकरार रखें या अपनी कुर्सी उन्होंने अपना प्रधानमंत्री पद महत्वपूर्ण माना और उपयुक्त तीनों बातों को लपेट कर रख दिया।

केशवानंद भारती मामले के खिलाफ फैसले देने वाले न्यायमूर्ति की सेवा वरिष्ठता की अवहेलना की गई यह हम इसके पूर्व देख चुके हैं। उस पर आई प्रतिक्रियाएं पढ़ने लायक था ।भारत के प्रथम सॉलिसिटर जनरल सीके दफ्तरी ने कहा, लोकतंत्र का यह कालाकलूटा दिन है। एमसी छागला ने कहा यह भारत के न्यायपालिका की स्वतंत्रता के अंत की शुरुआत। दिल्ली बार एसोसिएशन की प्रतिक्रिया है ।बदले की भावना से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर किया गया या क्रूर हमला है इससे न्यायपालिका की क्षमता और स्वतंत्रता जिस तरह खतरे में पड़ गई है उसी तरह सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान और प्रतिष्ठा भी खतरे में आ गई है। इन प्रतिक्रियाओं का इंदिरा गांधी पर कोई असर नहीं हुआ केंद्रीय मंत्री मोहन कुमारमंगलम ने तब लोकसभा में कहा मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय उस व्यक्ति की विचारधारा जीवन की ओर देखने का उसका दृष्टिकोण उसका तत्वज्ञान इसका विचार कर ही सरकार को निर्णय करना पड़ता है।

24 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा हुई आधी रात को देश के सभी विपक्षी दलों के लगभग सभी नेताओं को गिरफ्तार कर विभिन्न जेलों में भेज दिया गया गिरफ्तारी करने के लिए मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट( मिसा) का उपयोग किया गया इस कानून के अनुसार किसी को भी कभी भी कोई भी आरोप ना लगाते हुए न्यायालय में हाजिर किए बिना गिरफ्तार करने का अधिकार इंदिरा गांधी ने अपने हाथ में ले लिया। राज्य संविधान के अनुच्छेद 352 ,356, 360 के अंतर्गत राष्ट्रपति देश में अथवा देश के किसी राज्य में आपातकाल की स्थिति की घोषणा कर सकते हैं। अनुच्छेद 360 आर्थिक आपातकाल के बारे मे, जबकि अनुच्छेद 352 पूरे देश के लिए राज्य को बगाबत ,विदेशी, आक्रमण का खतरा पैदा होने पर अनुच्छेद 356 के अंतर्गत आपातकाल लागू किया जा सकता हैं। संविधान ने यह अधिकार राष्ट्रपति को दिया है ।राष्ट्पति मंत्रिमंडल के निर्णय से बंधे होते हैं इसीलिए व्यवहार में यह निर्णय मंत्रिमंडल का होता है। संविधान के अनुसार आपातकाल कि स्थिति केवल छह माह के लिए होतीं है, उसे दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा की मंजूरी अनिवार्य होती है अनुच्छेद 352 के अंतर्गत पूरे देश में आपातकाल घोषित होने पर मौलिक अधिकार का अनुच्छेद 19 स्थगित होता है। कुछ अधिकारों पर मर्यादाए आती है ।अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल के लिए इस्तेमाल किया जाता है ।25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया था।

यह आपातकाल तकनीकी दृष्टि से संविधान के अनुच्छेदों के अनुसार लागू हुआ लेकिन संविधान की नैतिकता की दृष्टि से असंवैधानिक हुआ। देश में बगावत अराजकता की स्थिति नहीं थी। जनता भ्रष्टाचार, अनाचार ,महंगाई के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे ,वह अराजकता नहीं फैला रही थी। सर्वत्रिक हिंसाचार नहीं कर रही थीं । लोकसभा राज्यसभा की मंजूरी के लिए विपक्ष के सांसदों का उपस्थित रहना जरूरी था उन्हें जेल में भेज भेजा गया था ।संसदीय मर्यादाओं का यह भंग था। संविधान के अनुच्छेदों का किस तरह उपयोग करें इसकी इंदिरा गांधी को सलाह देने के लिए सिद्धार्थ शंकर रे, हरीभाऊ गोखले जैसे कानूनी जानकार कहते मौजूद थे ।अब यह कहा जाता है कि राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने की सलाह बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे ने दी थी । द ड्रामेटिक डिकेड शीर्षक प्रणब मुखर्जी कि किताब में इसकी विसृस जानकारी दी गई हैं। फारुख उद्दीन अली अहमद तब राष्ट्रपति थे आपातकाल के आदेश पर हस्ताक्षर की थी।

Related Posts

Leave a Comment