नई दिल्ली

बड़े कॉरपोरेट ऋणों की वसूली जारी, 100 करोड़ से अधिक के 1,249 ऋण खाते राइट-ऑफ; राशि 4.19 लाख करोड़ रुपये

नई दिल्ली,केंद्र सरकार ने लोकसभा में स्पष्ट किया है कि बैंकों द्वारा बड़े खातों को ‘राइट-ऑफ’ (बट्टे खाते में डालना) का अर्थ ऋण माफ करना नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के तहत यह केवल एक लेखांकन (Accounting) प्रक्रिया है, जबकि ऐसे ऋणों की वसूली की कार्रवाई लगातार जारी रहती है।

लोकसभा में सांसद हनुमान बेनीवाल के प्रश्न के लिखित उत्तर में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा बड़े उद्योग एवं सेवा क्षेत्र के ऋण खातों को समय-समय पर बट्टे खाते में डाला जाता है, ताकि बैंकों की बैलेंस शीट साफ रहे। हालांकि इन खातों के विरुद्ध कानूनी एवं अन्य माध्यमों से वसूली की प्रक्रिया जारी रहती है।

सरकार ने बताया कि 31 मार्च 2026 तक की स्थिति में 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक राशि वाले 1,249 उधारकर्ताओं के ऋण खाते बट्टे खाते में डाले गए हैं। इन खातों में कुल 4,19,380 करोड़ रुपये की राशि शामिल है। सरकार ने यह भी कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 45-ई के तहत उधारकर्ताओं के नाम सार्वजनिक नहीं किए जा सकते।

लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्षवार बड़े उद्योग एवं सेवा क्षेत्र के राइट-ऑफ किए गए ऋणों में वर्ष 2019-20 के दौरान सर्वाधिक 1,33,179 करोड़ रुपये के ऋण बट्टे खाते में डाले गए। वहीं इस अवधि में विभिन्न वर्षों में इन खातों से वास्तविक वसूली भी की गई। वर्ष 2018-19 में सबसे अधिक 61,369 करोड़ रुपये की वसूली दर्ज की गई।

सरकार ने कहा कि बड़े कॉरपोरेट ऋणों की प्रभावी एवं समयबद्ध वसूली के लिए दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 तथा सरफेसी अधिनियम (SARFAESI Act) में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं। इसके अलावा ऋण वसूली अधिकरण (DRT) की व्यवस्था को भी मजबूत बनाया गया है, जिससे फंसे हुए ऋणों की वसूली तेज हो सके।

सरकार ने दोहराया कि राइट-ऑफ का अर्थ ऋण माफी नहीं है, बल्कि यह बैंकिंग व्यवस्था की एक नियमित लेखांकन प्रक्रिया है और संबंधित उधारकर्ताओं के खिलाफ वसूली की सभी वैधानिक कार्रवाई जारी रहती है।

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