सिवनी/चंपा।** सिवनी डीसी (Distribution Centre) में बिजली विभाग/संबंधित विभाग द्वारा जारी वाहन निविदा में एक बड़े घोटाले और अनियमितता का मामला सामने आया है। विभागीय अधिकारियों की साठगांठ और ठेकेदार की मनमानी के चलते निविदा के नियमों को ताक पर रखकर शासन को चूना लगाया जा रहा है।
### क्या है पूरा मामला?
विभाग द्वारा जारी **Notice Inviting Tender (NIT No. 035-45/ Pur/25-26/ NIT/07/1331, दिनांक 07.07.2025)** के अनुसार सिवनी डीसी में लाइन मेंटेनेंस और अन्य कार्यों के लिए 1.7 से 2.2 टन क्षमता (1.7 – 2.2 T capacity) का पिकअप वाहन चालक 02 वर्षों की अवधि के लिए अनुबंधित किया जाना था।
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ठेकेदार द्वारा शर्तों के विपरीत महज 1.3 टन क्षमता वाला वाहन चलाया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि जब निविदा बड़े क्षमता वाले वाहन के लिए निकाली गई थी और भुगतान भी उसी आधार पर लिया जा रहा है, तो कम क्षमता का वाहन किस आधार पर संचालित हो रहा है?

परिवहन विभाग की वेबसाइट पर खुलासा: पिकअप की जगह XUV300!

मामला तब और संदिग्ध हो जाता है जब परिवहन विभाग (RTO) की आधिकारिक वेबसाइट पर संबंधित वाहन के नंबर की जांच की गई। जांच में वाहन के विवरण में पिकअप के बजाय **XUV300 (कमर्शियल)** दर्ज दिखा रहा है।
इससे यह आशंका गहरा गई है कि:
क्या ठेकेदार द्वारा निविदा हासिल करने के लिए दस्तावेजों में जालसाजी (फ़ोटोशॉप या फर्जीवाड़ा) की गई है? या फिर विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों/कर्मचारियों की मिलीभगत से यह कार्यादेश जारी कर फर्जीवाड़े को अंजाम दिया गया है?
‘मुझे कुछ नहीं मालूम’— सहायक अभियंता (AE) का गैर-जिम्मेदाराना जवाब
जब इस पूरे फर्जीवाड़े के संबंध में क्षेत्र के सहायक अभियंता (AE) से फोन के माध्यम से बात की गई, तो उनका जवाब बेहद चौंकाने वाला और गैर-जिम्मेदाराना था। AE का कहना था— “मुझे नहीं पता, यह डिवीज़न वालों का काम है चेक करना, मुझे इस बारे में कुछ नहीं मालूम।”
अधिकारी का यह तर्क पूरी तरह से हास्यास्पद है क्योंकि नियमानुसार कार्यादेश जारी होने पर एक प्रति सहायक अभियंता को भेजी जाती है। इतना ही नहीं, हर महीने वाहन का बिल सहायक अभियंता के हस्ताक्षर और सत्यापन के बाद ही पास होने के लिए डिवीज़न कार्यालय भेजा जाता है। ऐसे में बिना गाड़ी और दस्तावेज देखे आँख बंद करके बिल पर हस्ताक्षर कर आगे बढ़ा देना अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका और सीधे तौर पर मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
कार्रवाई और रिकवरी की उठ रही मांग
इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार और निविदा शर्तों के उल्लंघन की बू आ रही है। स्थानीय नागरिकों एवं सजग तंत्र द्वारा शासन से मांग की जा रही है कि:
कार्यादेश तत्काल निरस्त किया जाए: फर्जीवाड़े के आधार पर जारी इस कार्यादेश को तुरंत रद्द किया जाए।
रिकवरी की जाए: ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा शासन को पहुंचाए गए वित्तीय नुकसान और अधिक वसूले गए पैसों की पाई-पाई रिकवरी की जाए।
कड़ी विभागीय व कानूनी कार्रवाई: आंख मूंदकर फर्जी बिलों को पास करने वाले सहायक अभियंता और दस्तावेजों की हेराफेरी करने वाले ठेकेदार पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
अब देखना यह है कि संबंधित उच्च अधिकारी इस गंभीर मामले का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराते हैं या फिर मामले को दबाने का प्रयास किया जाता है।




