छत्तीसगढ़

जल जीवन मिशन से बदली धुरबेड़ा की तस्वीर

धुरबेड़ा के सभी 54 परिवारों के घरों तक पहुंच रहा शुद्ध पेयजल

नारायणपुर, नारायणपुर जिला मुख्यालय से लगभग 65 किलोमीटर दूर, घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों के बीच बसे अबूझमाड़ क्षेत्र का ग्राम धुरबेड़ा कभी मूलभूत सुविधाओं से वंचित एक दूरस्थ गांव के रूप में जाना जाता था। पंचायत धुरबेड़ा के अंतर्गत आने वाले इस गांव में लगभग 54 परिवार निवास करते हैं। चारों ओर पहाड़, बीच-बीच में बहते नदी-नाले और कच्चे दुर्गम रास्तेयहां की पहचान थी। पहुंचविहीन क्षेत्र होने के कारण वर्षों तक विकास की योजनाएं यहां तक नहीं पहुंच पाती थीं। गांव के लोग मुख्यतः पेंदा खेती पर निर्भर हैं और कोदो, रागी जैसी पारंपरिक फसलें ही उनकी आजीविका का आधार रही हैं।
इन प्राकृतिक चुनौतियों के बीच सबसे बड़ी समस्या थी शुद्ध पेयजल की उपलब्धता। ग्रामीण महिलाओं को रोजाना कई किलोमीटर दूर जाकर नदी या झरनों से पानी लाना पड़ता था। बरसात में उफनते नालों को पार करना जोखिम भरा होता था, तो गर्मियों में जल स्रोत सूखने लगते थे। पानी की तलाश में घंटों का समय लग जाता था, जिससे बच्चों की पढ़ाई और परिवार की दिनचर्या प्रभावित होती थी। स्वच्छ पानी के अभाव में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी सामने आती थीं।
ऐसे कठिन समय में जल जीवन मिशन गांव के लिए परिवर्तन का माध्यम बना। 56.79 लाख रुपये की लागत से गांव में 2430 मीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई। साथ ही 10,000 लीटर क्षमता की दो सोलर टंकियां स्थापित की गईं, जिससे बिजली की कमी के बावजूद नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित हो सके। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद अधिकारियों, तकनीकी कर्मचारियों और ग्रामीणों के सहयोग से यह कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
आज धुरबेड़ा के सभी 54 परिवारों के घरों तक शुद्ध पेयजल पहुंच रहा है। अब महिलाओं को पानी के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ती। बच्चों को पढ़ाई और खेल के लिए अधिक समय मिल रहा है। गांव में स्वच्छता और स्वास्थ्य स्तर में उल्लेखनीय सुधार दिखाई दे रहा है। जल उपलब्धता ने न केवल जीवन को आसान बनाया है, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की भावना भी मजबूत की है। धुरबेड़ा की यह कहानी केवल पानी पहुंचाने की नहीं, बल्कि जीवन में आए व्यापक बदलाव की कहानी है।

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