नई दिल्ली

विनायक दामोदर सावरकर की पुण्यतिथि, स्वातंत्र्य वीर को विनम्र श्रद्धांजलि

26 फरवरी 1966 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अद्वितीय सेनानी, प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, ओजस्वी लेखक और समाज सुधारक वीर सावरकर का देहावसान हुआ। उनकी पुण्यतिथि केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, त्याग, साहस और वैचारिक दृढ़ता का स्मरण कराने वाला अवसर है। सावरकर का जीवन संघर्ष, विचार और कर्म का ऐसा संगम है, जिसने भारतीय राजनीति, समाज और स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा को गहराई से प्रभावित किया।
प्रारंभिक जीवन: राष्ट्रभावना का अंकुर
28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गाँव में जन्मे सावरकर बचपन से ही तेजस्वी, जिज्ञासु और राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत थे। उनके बड़े भाई गणेश (बाबाराव) सावरकर का भी उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। किशोरावस्था में ही उन्होंने “मित्र मेला” नामक संगठन की स्थापना की, जो आगे चलकर “अभिनव भारत” के रूप में विकसित हुआ। इस संगठन का उद्देश्य युवाओं में क्रांतिकारी चेतना और स्वाधीनता की भावना जगाना था।
लंदन प्रवास और क्रांतिकारी गतिविधियाँ
1906 में वे कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए, जहाँ वे इंडिया हाउस से जुड़े और वहाँ रहकर भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित प्रयास किए। इसी दौरान उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति “1857 का स्वातंत्र्य समर” लिखी, जिसमें 1857 के विद्रोह को “भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” बताया। यह पुस्तक ब्रिटिश सरकार के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण सिद्ध हुई और उस पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
लंदन में रहते हुए सावरकर ने क्रांतिकारी युवाओं को प्रेरित किया, हथियारों की व्यवस्था में सहयोग किया और स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष की रणनीति पर विचार किया। 1910 में उन्हें गिरफ्तार कर भारत लाया गया।
काला पानी की सजा और अदम्य धैर्य
सावरकर को दो-दो आजीवन कारावास (कुल 50 वर्ष) की सजा सुनाई गई और उन्हें अंडमान-निकोबार की सेल्युलर जेल भेज दिया गया। सेल्युलर जेल में उन्हें कठोर श्रम, बेड़ियों और अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ा। तेल कोल्हू चलाना, नारियल की रस्सी बनाना और एकांत कारावास—ये सब उनकी दिनचर्या का हिस्सा थे।
लेकिन इन यातनाओं ने उनके संकल्प को कमजोर नहीं किया। उन्होंने जेल की दीवारों पर कीलों और पत्थरों से कविताएँ लिखीं, जिन्हें बाद में साथियों ने याद कर सुरक्षित किया। उनका धैर्य और मानसिक दृढ़ता आज भी प्रेरणा का स्रोत है।
*वैचारिक योगदान और “हिंदुत्व” की अवधारणा*
सावरकर ने “हिंदुत्व” की वैचारिक अवधारणा प्रस्तुत की, जिसे उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार, राष्ट्र की पहचान साझा संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से निर्मित होती है। उनके विचारों ने आगे चलकर भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण बहसों को जन्म दिया और आज भी वे विमर्श का विषय बने हुए हैं।

समाज सुधारक के रूप में भूमिका

वीर सावरकर केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि समाज सुधारक भी थे। उन्होंने छुआछूत और जातिगत भेदभाव का विरोध किया। मंदिरों में सभी वर्गों के प्रवेश का समर्थन किया और सामाजिक समरसता पर बल दिया। रत्नागिरी में नजरबंदी के दौरान उन्होंने अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए सक्रिय अभियान चलाया और अंतरजातीय विवाह का समर्थन किया।
उनका मानना था कि जब तक समाज आंतरिक रूप से मजबूत और एकजुट नहीं होगा, तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं बन सकता।

साहित्यिक और बौद्धिक विरासत

सावरकर एक प्रखर लेखक और कवि भी थे। उनकी रचनाओं में राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान और आत्मबल की प्रेरणा स्पष्ट झलकती है। “माझी जन्मठेप” (मेरी आजीवन कारावास), “सिक्स ग्लोरियस एपॉक्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री” जैसी कृतियाँ उनके गहन अध्ययन और वैचारिक स्पष्टता को दर्शाती हैं।
उनकी लेखनी में एक ओर क्रांति की ज्वाला थी, तो दूसरी ओर सांस्कृतिक चेतना और आत्मसम्मान का संदेश।

विवाद और मूल्यांकन

सावरकर का जीवन और विचार विभिन्न दृष्टिकोणों से देखे जाते हैं। कुछ लोग उन्हें महान क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी विचारक मानते हैं, तो कुछ उनके राजनीतिक विचारों से असहमति भी रखते हैं। परंतु यह निर्विवाद है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान महत्वपूर्ण और प्रभावशाली रहा है।

अंतिम चरण और आत्मार्पण

जीवन के अंतिम दिनों में सावरकर ने “आत्मार्पण” का मार्ग चुना। उनका मानना था कि जब व्यक्ति का कर्तव्य पूर्ण हो जाए, तब शरीर का त्याग भी एक आध्यात्मिक निर्णय हो सकता है। 26 फरवरी 1966 को उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा, किंतु उनका विचार और प्रेरणा आज भी जीवित है।
*निष्कर्ष: प्रेरणा का अमर स्रोत*
वीर सावरकर का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र के लिए समर्पण, वैचारिक स्पष्टता और अदम्य साहस से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। उनकी पुण्यतिथि पर हम केवल श्रद्धांजलि अर्पित न करें, बल्कि यह संकल्प लें कि राष्ट्रहित, सामाजिक समरसता और आत्मनिर्भरता के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ेंगे।
स्वातंत्र्य वीर सावरकर जी को उनकी पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन। लेख उमेश पासवान वरिष्ठ पत्रकार व समाजसेवी

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